आज हर रिश्ता कागज़ का गुलाम है, और उस कागज़ को हम पैसा कहते हैं।


*रिश्ते हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं—उन्हें किसी कीमत पर बिकने मत दीजिए।*यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हमारे समय की उस सच्चाई का आईना है, जिसे स्वीकार करना आसान नहीं है। पैसा मनुष्य के जीवन की आवश्यकता है। घर चलाने के लिए पैसा चाहिए, बच्चों की शिक्षा के लिए पैसा चाहिए, इलाज के लिए पैसा चाहिए और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए भी पैसा चाहिए। लेकिन जब पैसा आवश्यकता से बढ़कर रिश्तों की कसौटी बन जाए, जब किसी व्यक्ति का सम्मान उसके चरित्र से नहीं बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति से होने लगे, तब सवाल केवल धन का नहीं रहता, बल्कि समाज की सोच का हो जाता है।

हमारे बुजुर्गों ने वह समय देखा है जब घर छोटे होते थे, साधन सीमित होते थे, लेकिन दिल बहुत बड़े होते थे। एक थाली में कई लोग भोजन कर लेते थे, एक कमरे में पूरा परिवार सो जाता था और किसी एक सदस्य की परेशानी पूरे परिवार की परेशानी मानी जाती थी। आज घर बड़े हैं, कमरे अधिक हैं, सुविधाएँ अनगिनत हैं, बैंक बैलेंस बढ़ रहे हैं, लेकिन कई बार रिश्तों के बीच वह गर्माहट कम होती दिखाई देती है, जो कभी परिवार की पहचान हुआ करती थी। आज व्यक्ति को देखकर सबसे पहले यह नहीं पूछा जाता कि वह कैसा इंसान है, बल्कि यह देखा जाता है कि वह करता क्या है, कितना कमाता है, कहाँ रहता है और उसके पास कितनी संपत्ति है। धीरे-धीरे हमने रिश्तों को भी आर्थिक तराजू पर तौलना शुरू कर दिया है।

*रिश्ते जब जरूरत बन जाएँ*— रिश्ता तब सबसे सुंदर होता है जब उसमें किसी लाभ की अपेक्षा न हो। माँ अपने बच्चे से इसलिए प्रेम नहीं करती कि वह भविष्य में उसे कुछ देगा। पिता अपने बच्चों की परवरिश इसलिए नहीं करते कि एक दिन बच्चे उनकी मेहनत का हिसाब चुकाएँगे। भाई-बहन का रिश्ता किसी बैंक खाते की तरह नहीं होता, जिसमें जमा और निकासी का हिसाब रखा जाए। लेकिन आज कई रिश्तों में एक अदृश्य हिसाब-किताब चल रहा है। किसने कितना दिया? किसने कितना खर्च किया? किसने किसके लिए क्या किया? कौन कितना कमाता है? किसके पास कितना घर है? किसके बच्चे कितने सफल हैं? इन सवालों ने रिश्तों की सहजता को कहीं न कहीं प्रभावित किया है। कई बार बुजुर्ग माता-पिता यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि जिस बच्चे के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया, आज उसी बच्चे के पास उनके लिए समय क्यों नहीं है। दूसरी ओर कुछ बच्चे यह सोचते हैं कि माता-पिता ने हमारे लिए किया ही क्या है, जबकि माता-पिता के त्याग को पैसों में मापा ही नहीं जा सकता। यही वह जगह है जहाँ रिश्ते कमजोर होने लगते हैं।

*पैसा रिश्तों का मालिक नहीं, साधन होना चाहिए*-पैसा बुरा नहीं है। पैसा जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम है। समस्या तब शुरू होती है जब पैसा साधन से बढ़कर जीवन का उद्देश्य बन जाता है। धन कमाना गलत नहीं है। मेहनत करके आगे बढ़ना गर्व की बात है। अपने परिवार को बेहतर जीवन देना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। लेकिन धन कमाने की दौड़ में यदि हम अपने ही लोगों को पीछे छोड़ दें, तो सफलता अधूरी है।

क्या फायदा उस बड़े घर का जिसमें माँ-बाप के लिए समय नहीं? क्या फायदा उस बैंक बैलेंस का जिसके बावजूद भाई-भाई से बात नहीं करते? क्या फायदा उस महंगी गाड़ी का जिसमें बैठकर हम अपने ही रिश्तों से दूर होते चले जाएँ? क्या फायदा उस सामाजिक प्रतिष्ठा का जिसमें घर के भीतर ही सम्मान नहीं बचा? धन जीवन को सुविधा दे सकता है, लेकिन प्रेम नहीं खरीद सकता। पैसा दवा खरीद सकता है, स्वास्थ्य नहीं। पैसा बिस्तर खरीद सकता है, नींद नहीं। पैसा मकान खरीद सकता है, घर नहीं। पैसा परिचितों की भीड़ ला सकता है, लेकिन सच्चा अपना व्यक्ति नहीं।

*संपत्ति के लिए टूटते परिवार*आज संपत्ति और पैसों को लेकर परिवारों में विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस तेजी से आर्थिक स्वार्थ रिश्तों को प्रभावित कर रहा है, वह चिंता का विषय है। कभी भाई एक-दूसरे की ताकत हुआ करते थे। आज कई परिवारों में जमीन-जायदाद के बंटवारे के साथ दिलों का भी बंटवारा हो जाता है। माता-पिता की संपत्ति किसे मिलेगी, किसके हिस्से में कितना आएगा, किसने अधिक योगदान दिया—इन प्रश्नों के कारण वर्षों पुराने संबंध टूट जाते हैं। विडंबना यह है कि जिस संपत्ति को पाने के लिए लोग लड़ते हैं, वह संपत्ति अंततः यहीं रह जाती है। साथ कुछ नहीं जाता। मनुष्य जीवन भर धन जोड़ता है, लेकिन कई बार धन जोड़ते-जोड़ते वह उन लोगों को खो देता है जिनके साथ वह उस धन का सुख बाँटना चाहता था।

*विवाह और रिश्तों में धन का प्रभाव*—विवाह दो व्यक्तियों के साथ-साथ दो परिवारों का संबंध माना जाता था। लेकिन आज कई बार विवाह भी आर्थिक अपेक्षाओं से प्रभावित दिखाई देता है। लड़के की नौकरी, वेतन, संपत्ति, परिवार की आर्थिक स्थिति—ये सब महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन यदि जीवनसाथी का चरित्र, व्यवहार, संस्कार और जिम्मेदारी पीछे छूट जाएँ, तो केवल आर्थिक स्थिति सुख की गारंटी नहीं बन सकती। इसी प्रकार विवाह के बाद भी पति-पत्नी के बीच पैसों को लेकर विवाद बढ़ते हैं। कौन कितना कमाता है, कौन कितना खर्च करता है, किसके परिवार पर कितना खर्च हुआ—यदि हर बात हिसाब में बदल जाए, तो प्रेम का स्थान धीरे-धीरे विवाद ले सकता है।

विवाह साझेदारी है, प्रतिस्पर्धा नहीं। जहाँ “मेरा” और “तुम्हारा” हर समय बड़ा होता रहे, वहाँ “हमारा” छोटा पड़ जाता है।

*बुजुर्गों की सबसे बड़ी पीड़ा*— हमारे समाज में बुजुर्गों की सबसे बड़ी आवश्यकता अक्सर पैसा नहीं, बल्कि सम्मान और साथ होता है। जिस माँ ने अपने बच्चे की छोटी-सी जरूरत के लिए अपनी इच्छाएँ छोड़ दीं, उसे वृद्धावस्था में महंगे उपहारों से अधिक शायद दो प्रेम भरे शब्द चाहिए।

जिस पिता ने अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए जीवन भर मेहनत की, उसे बुढ़ापे में बैंक खाते से अधिक अपने बच्चों का समय चाहिए। कई माता-पिता कहते नहीं, लेकिन उनके मन में यह प्रश्न जरूर होता है—“क्या अब मैं अपने बच्चे के लिए बोझ बन गया हूँ?”

यह प्रश्न किसी भी समाज के लिए बहुत गंभीर होना चाहिए

बुजुर्गों को सम्मान देने का अर्थ केवल उन्हें पैसे देना नहीं है। उनके पास बैठना, उनकी बातें सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें यह महसूस कराना कि वे आज भी परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य हैं—यही सच्ची सेवा है।बच्चों को हम क्या सिखा रहे हैं?—आज की सबसे बड़ी चिंता केवल यह नहीं है कि समाज में पैसा बढ़ रहा है। चिंता यह है कि हम बच्चों को सफलता का अर्थ क्या सिखा रहे हैं।

यदि बच्चा बचपन से यह देखता है कि परिवार में सम्मान केवल अमीर व्यक्ति को मिलता है, तो वह भी यही सीखेगा कि पैसा ही व्यक्ति की कीमत तय करता है।

यदि बच्चा देखता है कि गरीब रिश्तेदार को घर में सम्मान नहीं मिलता और अमीर रिश्तेदार के आने पर पूरा परिवार स्वागत में खड़ा हो जाता है, तो उसके मन में एक संदेश जाता है—“इंसान की कीमत उसके पास मौजूद धन से है।”

हमें इस सोच को बदलना होगा। बच्चों को बताना होगा कि पैसा महत्वपूर्ण है, लेकिन ईमानदारी उससे बड़ी है। पद महत्वपूर्ण है, लेकिन विनम्रता उससे बड़ी है। सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन इंसानियत उससे बड़ी है।

*सोशल मीडिया और दिखावे की अर्थव्यवस्था*—आज सोशल मीडिया ने भी आर्थिक तुलना को बढ़ाया है। किसी की नई कार, किसी का बड़ा घर, किसी की विदेश यात्रा, किसी का महंगा समारोह—इन सबको देखकर लोग अपने जीवन की तुलना दूसरों से करने लगते हैं।

दिखावे की यह संस्कृति धीरे-धीरे रिश्तों में भी प्रवेश कर गई है। अब कई बार खुशी इस बात से नहीं मापी जाती कि समारोह में कितने लोग दिल से खुश थे, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि आयोजन कितना भव्य था। हमने खुशियों को भी प्रदर्शन में बदल दिया है। लेकिन जीवन का सबसे सुंदर सुख वह है जिसे कैमरे की जरूरत नहीं होती—माँ की गोद, पिता का हाथ, भाई का साथ, बहन की हँसी, जीवनसाथी का भरोसा और बच्चों की मासूम मुस्कान।

*पैसा हो, लेकिन रिश्तों से बड़ा नहीं*—हमें पैसा कमाना चाहिए। खूब कमाना चाहिए। लेकिन पैसा कमाते समय यह भी याद रखना चाहिए कि हम किसके लिए कमाते हैं।

यदि परिवार के लिए कमाया गया पैसा परिवार को ही समय न दे पाए, तो कहीं न कहीं संतुलन बिगड़ गया है।

यदि बच्चे के भविष्य के लिए इतना काम किया जाए कि उसके बचपन में माता-पिता की उपस्थिति ही न रहे, तो भविष्य की सुरक्षा के साथ वर्तमान की खुशी खो जाती है।

यदि धन कमाने के लिए रिश्तों में कड़वाहट आ जाए, तो कमाई का एक हिस्सा उस नुकसान की भरपाई में कभी काम नहीं आएगा। जीवन में आर्थिक सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

*हर रिश्ता लाभ का सौदा नहीं होता*—हमें यह समझना होगा कि दुनिया में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका मूल्य किसी मुद्रा में नहीं लगाया जा सकता। माँ का प्रेम—अमूल्य है।

पिता का त्याग—अमूल्य है।

भाई-बहन का बचपन—अमूल्य है।

सच्चे मित्र का साथ—अमूल्य है।

जीवनसाथी का विश्वास—अमूल्य है।

बच्चे की मुस्कान—अमूल्य है।

किसी दुख के समय बिना बुलाए आपके पास खड़ा हो जाना—अमूल्य है।

जिस रिश्ते में व्यक्ति आपके पास तब भी रहे जब आपके पास देने के लिए कुछ न हो, वही रिश्ता सच्चा है

*रिश्तों की असली परीक्षा*—रिश्ते की असली परीक्षा तब होती है जब व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर हो जाए। सफलता के समय तो बहुत लोग साथ खड़े होते हैं। लेकिन कठिन समय में जो हाथ पकड़ता है, वही अपना है। जब जेब खाली हो और कोई फिर भी पूछे—“तुम ठीक तो हो?”

जब बीमारी में कोई रातभर जागे। जब असफलता में कोई कहे—“कोई बात नहीं, फिर कोशिश करेंगे।”

जब दुनिया आलोचना करे और कोई कहे—“मैं तुम्हारे साथ हूँ।” ऐसे रिश्तों की कीमत लाखों-करोड़ों में नहीं लगाई जा सकती। समाज को फिर से संवेदनशील होना होगा—हम जिस समाज का निर्माण कर रहे हैं, उसमें आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन संवेदनशीलता उससे भी अधिक आवश्यक है। हमें बच्चों को केवल प्रतियोगिता नहीं, सहयोग भी सिखाना होगा। केवल कमाना नहीं, बाँटना भी सिखाना होगा। केवल आगे बढ़ना नहीं, पीछे छूटे व्यक्ति का हाथ पकड़ना भी सिखाना होगा। केवल अधिकार नहीं, कर्तव्य भी समझाना होगा। समाज तब मजबूत होता है जब व्यक्ति केवल यह नहीं पूछता कि “मुझे क्या मिलेगा?”, बल्कि यह भी सोचता है कि “मैं किसी के लिए क्या कर सकता हूँ?”

*रिश्तों में हिसाब कम कीजिए*—रिश्तों को बचाने का सबसे सरल तरीका है—हर बात का हिसाब रखना बंद कीजिए। आपने किसी के लिए कुछ किया है तो उसे एहसान मत बनाइए। किसी ने आपके लिए कुछ किया है तो उसे भूलिए मत । हर संबंध में बराबर-बराबर देना संभव नहीं होता। कभी एक व्यक्ति अधिक देता है, कभी दूसरा। कभी एक मजबूत होता है, कभी दूसरा। रिश्ते बराबरी के हिसाब से नहीं, समझदारी और संवेदना से चलते हैं। यदि माँ ने बचपन में आपकी सौ जरूरतें पूरी कीं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि बुढ़ापे में उनकी हर जरूरत के बदले सौ बार हिसाब लिया जाए। माँ-बाप का प्यार कोई कर्ज नहीं है।

*धन की नहीं, मन की समृद्धि*—सच्ची समृद्धि केवल बैंक खाते में नहीं होती। एक व्यक्ति करोड़पति होकर भी अकेला हो सकता है और दूसरा साधारण जीवन जीकर भी अत्यंत समृद्ध हो सकता है। जिसके घर में प्रेम है, वह समृद्ध है। जिसके पास अपनों के लिए समय है, वह समृद्ध है।

जिसके माता-पिता उसके साथ मुस्कुराते हैं, वह समृद्ध है। जिसके बच्चे उससे अपनी हर बात कह सकते हैं, वह समृद्ध है। जिसके मित्र उसके सुख-दुख में साथ हैं, वह समृद्ध है। धन की समृद्धि जीवन को सुविधाजनक बनाती है, लेकिन मन की समृद्धि जीवन को सुंदर बनाती है।

*हमें तय करना होगा कि हमारा मूल्य क्या है।*— 

आज जरूरत है कि हम स्वयं से कुछ प्रश्न पूछें—

क्या हम किसी व्यक्ति को उसके चरित्र से पहचानते हैं या उसकी आर्थिक स्थिति से? क्या हम गरीब रिश्तेदार से उतना ही सम्मानपूर्वक बात करते हैं जितना किसी संपन्न रिश्तेदार से? क्या हम अपने माता-पिता को पर्याप्त समय देते हैं

क्या हम अपने बच्चों को केवल पैसा कमाने की शिक्षा दे रहे हैं या अच्छा इंसान बनने की भी? क्या हमारे रिश्ते प्रेम से चल रहे हैं या अपेक्षाओं से? क्या हम किसी व्यक्ति से इसलिए जुड़े हैं क्योंकि वह हमारे काम आता है ? इन सवालों के जवाब शायद हमें अपने समाज का आईना दिखा दें

*अंततः रिश्ते कागज से नहीं, दिल से चलते हैं*—पैसा कागज पर छपा हुआ मूल्य हो सकता है, लेकिन इंसान का वास्तविक मूल्य उसके व्यवहार में दिखाई देता है।

एक नोट की कीमत निश्चित होती है, लेकिन एक सच्चे रिश्ते की कीमत तय नहीं की जा सकती। धन आज है, कल नहीं भी हो सकता। संपत्ति आज हमारे नाम है, कल किसी और के नाम हो सकती है। पद आज है, कल समाप्त हो सकता है। लेकिन किसी के दिल में हमारे लिए सम्मान और प्रेम बना रहे, तो यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हमें ऐसा जीवन नहीं चाहिए जिसमें हमारी तस्वीरें बड़ी हों और रिश्ते छोटे। हमें ऐसा घर नहीं चाहिए जिसमें सामान बहुत हो और बातचीत कम। हमें ऐसी सफलता नहीं चाहिए जिसमें दुनिया हमें सफल कहे, लेकिन अपने ही लोग हमें अपना न समझें। इसलिए पैसा कमाइए, संपत्ति बनाइए, सफलता हासिल कीजिए—लेकिन अपने रिश्तों को उसकी कीमत मत बनने दीजिए।

किसी माँ की आँखों में अपने बच्चे के लिए प्रेम को बैंक बैलेंस से मत तौलिये। किसी पिता के त्याग को पैसों में मत गिनिये। किसी भाई की मदद को सौदे में मत बदलिए। किसी बहन के स्नेह को अपेक्षाओं से मत बाँधिए।

जीवनसाथी के प्रेम को आर्थिक योगदान की प्रतियोगिता मत बनाइए। और अपने बच्चों को यह जरूर सिखाइए कि बड़ा इंसान वह नहीं जिसके पास सबसे अधिक पैसा हो, बल्कि वह है जिसके पास सबसे बड़ा दिल हो।

*आज सचमुच बहुत से रिश्ते उस कागज के गुलाम होते जा रहे हैं, जिसे हम पैसा कहते हैं। लेकिन अभी भी समय है कि हम इस गुलामी से रिश्तों को आजाद करें।*

क्योंकि अंत में जब जीवन की शाम आएगी, तब कोई यह याद नहीं करेगा कि हमारे बैंक खाते में कितने रुपये थे। याद यह किया जाएगा कि हमने कितने दिलों को छुआ था, कितने चेहरों पर मुस्कान लाई थी और हमारे जाने के बाद कितने लोगों की आँखें सच में नम हुई थीं। *धन हमारे जीवन का हिस्सा है, जीवन का अर्थ नहीं।*

*लेखिका—ऊषा शुक्ला*

*इफको आंवला बरेली यूपी*