तुम्हारी याद

तुम्हारी याद आती है मुझे माँ।


बनाती थीं कभी जब तुम स्वेटर 

चुना करतीं मुलायम ऊन अक्सर

किताबों से डिजाइन सीखतीं जो

सजा देतीं उसे मोती पिरोकर

मैं जब भी पहनती हूँ वो स्वेटर

सदा महसूस करती हूँ तुझे माँ।


सजाकर भाल पर चंदा सी कुमकुम

खिलातीं साग सरसों का मुझे तुम

मधानी से कभी लस्सी रिड़कतीं

तो पीने बैठ जाते हम धमाधम

मैं अब भी पी रही हूँ प्रेम का रस 

मगर ये प्यास है कि न बुझे माँ।


मेरे बालों को जब तुम गूँधती थीं

मेरी आँखें सुकूँ से ऊँघती थीं 

मुझे लगता था ये जन्नत है कोई

जहाँ खुशियों की परियाँ झूमती थीं 

नहीं जब से रहीं तुम पास मेरे

खुशी की राह सूझे न मुझे माँ।


तुम्हारी याद आती है मुझे माँ।












मनजीत शर्मा 'मीरा'