अपना संडे प्यारा संडे

अपना संडे प्यारा संडे।

छुट्टियों का जो रहता दिन, 

सब कोई अपने - अपने घर में रहते 

सुबह देर तक सब सोते रहते।

घर की साफ सफाई होती।

तरह -तरह के बनते पकवान,

उस दिन आते जाते मेहमान ‌।

बच्चे मौज मनाते रहते,

तरह -तरह का बजता बीन,

आपस में यूं लड़ जाते बच्चे,

देखो मम्मी चिंटू मारा,

देखो मम्मी टुक टुक मारा।

छोटू सहमा रहता बेचारा।

मुनिया दुबक गयी बेचारी,

कमजोर थी और थी लाचारी

कोई मंदिर मे आशाओं के दीप जलाता

कोई मस्जिद में दुआ को जाता

कोई गुरुद्वारा में मत्था टेकता।

कोई चर्च में मोमबत्तियां जलाता।

सोमवार से फिर शुरू वही खेल

तेज रफ्तार से दौडती जिंदगी की रेल

सब अपने कामों में लग जाता।

सोमवार से शनिवार तक सब 

काम मे व्यस्त हो जाता

रविवार का फिर हो जाता मेल 

पूरे जीवन का यही है खेल









डॉ कौशल किशोर 

साहित्यकार, लेखक सह शिक्षक।

पटना, बिहार